महाभारत
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Description
महाभारत महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य और सनातन संस्कृति का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह केवल कौरवों और पांडवों के युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि धर्म, नीति, कर्म और मानव जीवन के गहरे सत्यों का संग्रह है।
मूल कथा (संक्षेप में)
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कुरु वंश और विभाजन: हस्तिनापुर के राजा पांडु के पाँच पुत्र (पांडव) और उनके दृष्टिहीन बड़े भाई धृतराष्ट्र के सौ पुत्र (कौरव) थे। पांडवों की योग्यता और धर्मपरायणता देखकर दुर्योधन (कौरवों का सबसे बड़ा भाई) उनसे ईर्ष्या करने लगा।
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द्यूत क्रीड़ा और द्रौपदी चीरहरण: शकुनि के छल-कपट से दुर्योधन ने जुए (द्यूत क्रीड़ा) में युधिष्ठिर का सब कुछ—राज्य, धन और यहाँ तक कि द्रौपदी को भी जीत लिया। भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण का प्रयास किया गया, जिसके बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास भुगतना पड़ा।
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कुरुक्षेत्र का युद्ध: वनवास पूरा होने के बाद भी दुर्योधन ने पांडवों को बिना युद्ध के “सुई की नोक बराबर भूमि” देने से भी मना कर दिया। परिणामस्वरूप, धर्म और अधर्म के बीच कुरुक्षेत्र का 18 दिनों का भयानक युद्ध हुआ।
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भगवद गीता का उपदेश: युद्धभूमि में जब अर्जुन अपनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो गए, तब उनके सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ‘भगवद गीता’ का ज्ञान दिया और निष्काम कर्म का मार्ग दिखाया।
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परिणाम: युद्ध में कौरवों की हार हुई और धर्म की स्थापना के साथ पांडव विजयी हुए, परंतु इस विनाशकारी युद्ध में भारी रक्तपात हुआ।
मुख्य पात्र (Key Characters)
| पात्र | परिचय एवं भूमिका |
| भगवान श्रीकृष्ण | विष्णु जी के अवतार, पांडवों के मार्गदर्शक और अर्जुन के सारथी। |
| भीष्म पितामह | कुरु वंश के पितामह, अपनी भीषण प्रतिज्ञा और इच्छा-मृत्यु के वरदान के लिए प्रसिद्ध। |
| युधिष्ठिर | पांडवों में सबसे बड़े, जिन्हें ‘धर्मराज’ कहा जाता है। |
| अर्जुन | विश्व के श्रेष्ठ धनुर्धर और श्रीकृष्ण के परम मित्र/भक्त। |
| कर्ण | कुंती का ज्येष्ठ पुत्र, महान दानवीर और दुर्योधन का परम मित्र। |
| द्रौपदी | पांडवों की पत्नी, जो न्याय और आत्मसम्मान का प्रतीक हैं। |
| दुर्योधन | कौरवों का नेता, जो अहंकार, द्वेष और अधर्म का प्रतीक बना। |
प्रमुख शिक्षाएँ
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धर्म और अधर्म: अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में विजय सत्य और धर्म की ही होती है।
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कर्म की प्रधानता: इंसान का अधिकार केवल उसके कर्म पर है, उसके फल पर नहीं।
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अहंकार और ईर्ष्या का विनाश: दुर्योधन का अहंकार पूरे कुरु वंश के सर्वनाश का कारण बना।





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